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Friday, August 1, 2008

24 तर्ज ;-जरा सामने तो आओ छलिये (जनम जनम के फेरे) (राग-शिवरंजनी)

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तर्ज ;-जरा सामने तो आओ छलिये (जनम जनम के फेरे)  (राग-शिवरंजनी)
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तेरे दर पे खड़ा हूँ प्रभु वीर जी
मेरे मन में तूं जाने है क्या बात है
तुझे सुननी पड़ेगी फरियाद अब
मेरी आत्मा की ये आवाज है

हम तुम्हें चाहें तुम नहीं चाहो , ऐसा कभी नहीं हो सकता
पिता अपने बालक से बिछड़ कर, सुख से कभी ना रह सकता
मुझसे यूँ नाराजी की क्या बात है
मेरा मन तो तेरे चरणों का दास है
यूँ ठुकराओ ना ओ म्हारा वीरजी
मेरी आत्मा की ये आवाज है --------तेरे दर पे ---------

मोह माया में फंसा हुआ मै कब से भटकता ओ जिनजी
दुःख में पुकारूँ तुमको प्रभु मै ,सुख में भूल जाऊं जिनजी

मेरा मन तो पापों का भंडार है
गलती कर कर के करता पुकार है
यूँ ठुकराओ ना ओ म्हारा वीरजी
मेरी आत्मा की ये आवाज है

दयावान तूं क्षमावान् तूं ,करता ज्ञान का है प्रकाश
मुझ अज्ञानी आतम में भी, सम्यक ज्ञान का कर दे प्रकाश
मेरी नैया तो अब तेरे हाथ है
भव सागर में इक तेरा साथ है
यूँ ठुकराओ ना ओ म्हारा वीरजी
मेरी आत्मा की ये आवाज है ------------तेरे दर पे -----------------
रचयिता -राजू बगडा-"राजकवि"(सुजानगढ़)मदुरै
ता;-२६.०९.१९८२
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